Jharkhand News :सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन की समीक्षा कर रहा हाई कोर्ट, 30 जुलाई तक राज्य सरकार को शपथपत्र के माध्यम से देनी होगी पूरी जानकारी
Jharkhand News :झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य के सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज मामलों की वर्तमान स्थिति पर विस्तृत शपथपत्र दाखिल करे। मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनप्रतिनिधियों से जुड़े आपराधिक मामलों की अद्यतन जानकारी अदालत के समक्ष रखी जानी चाहिए ताकि न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
बुधवार को झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आर. मुखोपाध्याय और जस्टिस ए.के. राय की खंडपीठ में इस मामले पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता मृणाल क्रांति राय ने अदालत को बताया कि राज्य के विभिन्न जिला न्यायालयों से सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की जानकारी एकत्र की जा रही है। उन्होंने कहा कि विभिन्न जिलों से अद्यतन आंकड़े प्राप्त करने में समय लग रहा है, जिसके कारण अदालत में जवाब दाखिल करने में देरी हुई है।
अदालत ने राज्य सरकार के इस पक्ष को सुनने के बाद स्पष्ट निर्देश दिया कि सभी आवश्यक जानकारियों के साथ शपथपत्र दाखिल किया जाए। अदालत यह जानना चाहती है कि जनप्रतिनिधियों के खिलाफ कितने मामले लंबित हैं, उनमें से कितने गंभीर प्रकृति के हैं और उन मामलों में पीड़ितों की वर्तमान स्थिति क्या है। हाई कोर्ट का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की नियमित निगरानी आवश्यक है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने अधिवक्ता मनोज टंडन को न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त किया है। न्याय मित्र अदालत को तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर स्वतंत्र सहायता प्रदान करेंगे। यह मामला उन जनप्रतिनिधियों से जुड़ा है जिनके खिलाफ विभिन्न आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं और जिनकी सुनवाई लंबे समय से लंबित है।
गौरतलब है कि इस मामले में हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने यह कदम आपराधिक पृष्ठभूमि वाले जनप्रतिनिधियों के मामलों में तेजी लाने और न्यायिक प्रक्रिया की निगरानी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया है। हाई कोर्ट यह भी देख रहा है कि इन मामलों में जांच और सुनवाई की प्रक्रिया किस स्तर पर है तथा कहीं अनावश्यक देरी तो नहीं हो रही है।
इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट के वे निर्देश हैं, जिनमें जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों का शीघ्र निपटारा करने पर जोर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि जिन मामलों में आरोप पत्र दाखिल हो चुका है, उनका निष्पादन यथासंभव एक वर्ष के भीतर किया जाए। इसी निर्देश के अनुपालन की समीक्षा के लिए देश के विभिन्न उच्च न्यायालय ऐसे मामलों की निगरानी कर रहे हैं।
झारखंड हाई कोर्ट की यह पहल राज्य में राजनीतिक जवाबदेही और न्यायिक पारदर्शिता की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत का उद्देश्य केवल लंबित मामलों की संख्या जानना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि गंभीर आरोपों वाले मामलों में न्यायिक प्रक्रिया प्रभावी ढंग से आगे बढ़े। इससे जनता का न्याय व्यवस्था पर विश्वास मजबूत होगा और राजनीतिक व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ेगी।
अब सभी की नजरें 30 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि तब तक राज्य सरकार अदालत के समक्ष सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों का विस्तृत ब्यौरा पेश करेगी। इसके बाद हाई कोर्ट यह तय करेगा कि मामलों के त्वरित निपटारे और निगरानी के लिए आगे क्या कदम उठाए जाने चाहिए।
