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Wednesday, June 10, 2026
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Jharkhand High Court : बिहार की तर्ज पर सहकारिता पदाधिकारियों का ग्रेड पे होगा 4600, सरकार को 8 सप्ताह में आदेश जारी करने का निर्देश

Jharkhand High Court : हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये को बताया भेदभावपूर्ण, कहा- राज्य विभाजन के कारण कर्मचारियों को वेतन लाभ से वंचित नहीं रखा जा सकता 

Jharkhand High Court : झारखंड हाई कोर्ट ने सहकारिता प्रसार पदाधिकारियों के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उनका ग्रेड पे 4200 से बढ़ाकर 4600 करने का निर्देश दिया है। अदालत ने राज्य सरकार को आठ सप्ताह के भीतर औपचारिक आदेश जारी करने और सभी वित्तीय लाभ देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि बिहार में समान पद पर कार्यरत अधिकारियों को उच्च वेतनमान मिलने के बावजूद झारखंड के कर्मचारियों को इससे वंचित रखना अनुचित और भेदभावपूर्ण है।

Jharkhand High Court Order: सहकारिता प्रसार पदाधिकारियों को मिला बड़ा राहतभरा फैसला

झारखंड के सहकारिता प्रसार पदाधिकारियों के लिए हाई कोर्ट से बड़ी राहत की खबर सामने आई है। झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सहकारिता प्रसार पदाधिकारियों का ग्रेड पे 4200 रुपये से बढ़ाकर 4600 रुपये किया जाए। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि समान कार्य करने वाले कर्मचारियों को केवल राज्य विभाजन के आधार पर अलग-अलग वेतनमान देना न्यायसंगत नहीं है।

यह आदेश झारखंड हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने बुधवार को सुनवाई के दौरान पारित किया। अदालत ने मामले में दाखिल याचिका पर सुनवाई के बाद राज्य सरकार को आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

बिहार में पहले से मिल रहा है 4600 ग्रेड पे

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मनोज टंडन और सिद्धार्थ रंजन ने अदालत को बताया कि बिहार सरकार ने वर्ष 2017 में सहकारिता प्रसार पदाधिकारियों का ग्रेड पे बढ़ाकर 4600 रुपये कर दिया था। इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा भी पर्यवेक्षी और निरीक्षणीय संवर्ग के कर्मचारियों को इसी स्तर का वेतनमान प्रदान किया जा रहा है।

इसके बावजूद झारखंड सरकार ने अब तक इस विषय में कोई निर्णय नहीं लिया था, जिसके कारण राज्य के सहकारिता प्रसार पदाधिकारी लंबे समय से वेतन विसंगति का सामना कर रहे थे।

अविभाजित बिहार में हुई थी कई कर्मचारियों की नियुक्ति

सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि याचिका दायर करने वाले सात कर्मचारियों में से पांच की नियुक्ति अविभाजित बिहार के समय हुई थी। कोर्ट ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि यदि राज्य का विभाजन नहीं हुआ होता, तो इन कर्मचारियों को भी वही वेतनमान और सुविधाएं प्राप्त होतीं जो आज बिहार में कार्यरत अधिकारियों को मिल रही हैं।

अदालत ने कहा कि केवल राज्य विभाजन के कारण कर्मचारियों को कम वेतनमान देना न तो न्यायोचित है और न ही संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप।

पंचायत सचिवों के मामले का भी दिया उदाहरण

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि झारखंड सरकार पूर्व में पंचायत सचिवों के वेतनमान संबंधी मामले में बिहार सरकार के निर्णय का अनुसरण कर चुकी है। ऐसे में सहकारिता प्रसार पदाधिकारियों के मामले में अलग रुख अपनाना तर्कसंगत नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि जब समान परिस्थितियों में पहले बिहार सरकार के फैसलों को स्वीकार किया गया है, तब इस मामले में अलग नीति अपनाना उचित नहीं है।

सरकार के रवैये पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे अनुचित, अव्यवहारिक और नौकरशाही शक्ति के दुरुपयोग की श्रेणी में माना। अदालत ने कहा कि कर्मचारियों के साथ इस प्रकार का व्यवहार समानता के अधिकार के विपरीत है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी नीतियां कर्मचारियों के हितों और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होनी चाहिए। यदि अन्य राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा समान पदों पर बेहतर वेतनमान दिया जा रहा है, तो झारखंड सरकार को भी इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाने चाहिए।

आठ सप्ताह में आदेश और चार सप्ताह में मिलेगा लाभ

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह आठ सप्ताह के भीतर सहकारिता प्रसार पदाधिकारियों का ग्रेड पे बढ़ाने संबंधी औपचारिक आदेश जारी करे। इसके बाद अगले चार सप्ताह के भीतर सभी वित्तीय और अन्य सेवा लाभ संबंधित कर्मचारियों को उपलब्ध कराए जाएं।

इस आदेश के साथ ही अदालत ने याचिका का निष्पादन कर दिया है। माना जा रहा है कि इस फैसले से राज्य के सहकारिता विभाग में कार्यरत कई कर्मचारियों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा और लंबे समय से चली आ रही वेतन विसंगति का समाधान होगा।

कर्मचारियों में खुशी का माहौल

हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद सहकारिता प्रसार पदाधिकारियों और उनके संगठनों में खुशी का माहौल है। कर्मचारियों का कहना है कि वे लंबे समय से समान कार्य के लिए समान वेतनमान की मांग कर रहे थे। अदालत के इस फैसले से न केवल आर्थिक लाभ मिलेगा बल्कि कर्मचारियों का मनोबल भी बढ़ेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में अन्य वेतन विसंगति से जुड़े मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण साबित हो सकता है।

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