JTET Language Dispute : असुर, बिरहोर और मालतो जैसी जनजातीय भाषाओं को भी JTET सूची से हटाने की चर्चा तेज, भाषाई पहचान और सांस्कृतिक सम्मान पर उठे सवाल
JTET Language Dispute : झारखंड में JTET भाषा विवाद नया मोड़ लेता दिख रहा है। मैथिली, भोजपुरी और अंगिका जैसी भाषाओं को हटाने के बाद अब असुर, बिरहोर और मालतो सहित कई जनजातीय भाषाओं को भी सूची से बाहर किए जाने की बात सामने आई है। इस फैसले से भाषाई पहचान, सांस्कृतिक संरक्षण और स्थानीय प्रतिनिधित्व को लेकर बहस तेज हो गई है।
JTET भाषा विवाद में नया मोड़, कई जनजातीय भाषाएं भी सूची से बाहर
झारखंड में शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी JTET (Jharkhand Teacher Eligibility Test) को लेकर चल रहा भाषा विवाद अब और व्यापक रूप लेता नजर आ रहा है। शुरुआत में यह मुद्दा मैथिली, भोजपुरी, अंगिका और मगही जैसी भाषाओं को परीक्षा सूची से बाहर करने तक सीमित दिखाई दे रहा था, लेकिन अब इस मामले में कई जनजातीय भाषाओं के भी प्रभावित होने की जानकारी सामने आई है। इससे यह विवाद केवल क्षेत्रीय भाषाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राज्य की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है।
मिली जानकारी के अनुसार असुर, बिरहोर और मालतो जैसी कई जनजातीय भाषाओं को भी JTET परीक्षा की सूची से हटाया गया है। हालांकि इन भाषाओं को लेकर अभी तक सार्वजनिक स्तर पर उतनी चर्चा नहीं हुई जितनी अन्य भाषाओं को लेकर हो रही है। इसके अलावा कुछ अन्य छोटी क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाएं भी इस निर्णय से प्रभावित बताई जा रही हैं, लेकिन उनकी विस्तृत जानकारी अभी व्यापक रूप से सामने नहीं आई है।
झारखंड की पहचान उसकी सांस्कृतिक विविधता और भाषाई समृद्धि से जुड़ी रही है। यहां बड़ी संख्या में विभिन्न समुदायों और जनजातीय समूहों की अपनी-अपनी भाषाएं और बोलियां हैं। राज्य गठन के समय से ही स्थानीय पहचान और भाषाई सम्मान को लेकर आंदोलन होते रहे हैं। ऐसे में किसी परीक्षा या सरकारी नीति में भाषाओं को शामिल या बाहर करने का फैसला सीधे तौर पर लोगों की भावनाओं और पहचान से जुड़ जाता है।
भाषा विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि यदि किसी भाषा को सरकारी प्रक्रियाओं और शैक्षणिक व्यवस्था से बाहर किया जाता है, तो इससे उसके अस्तित्व पर भी प्रभाव पड़ सकता है। उनका कहना है कि शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाएं किसी भी भाषा के संरक्षण और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यदि भाषाओं को अवसरों से दूर किया जाएगा, तो नई पीढ़ी में उनके उपयोग और महत्व में गिरावट आ सकती है।
सरकार की ओर से लगातार यह कहा जाता रहा है कि स्थानीय भाषाओं और संस्कृति को बढ़ावा देना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है। कई मंचों पर क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं के संरक्षण की बात भी कही जाती रही है। लेकिन JTET विवाद के बाद सरकार की नीतियों और फैसलों पर सवाल खड़े होने लगे हैं। आलोचकों का कहना है कि एक ओर स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर परीक्षा व्यवस्था में कई भाषाओं को बाहर किया जा रहा है।
इस विवाद को शांत करने और समाधान निकालने के उद्देश्य से सरकार ने मंत्रियों की एक समिति का गठन किया है। इस समिति को भाषाई विवाद और उससे जुड़े विभिन्न पक्षों पर विचार करने की जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि समिति के गठन के बाद एक नया सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। कई सामाजिक और जनजातीय संगठनों का कहना है कि इस समिति में जनजातीय समुदायों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
उनका मानना है कि यदि जनजातीय भाषाओं से जुड़ा मामला है, तो संबंधित समुदायों के प्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। बिना उनकी राय लिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। इस मुद्दे पर विभिन्न संगठनों ने सरकार से पुनर्विचार की मांग भी की है।
राजनीतिक स्तर पर भी यह मामला धीरे-धीरे चर्चा का विषय बनता जा रहा है। विपक्षी दल सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि कई सामाजिक संगठन इसे भाषाई अधिकारों से जुड़ा विषय बता रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक गंभीर रूप ले सकता है।
फिलहाल यह स्पष्ट हो चुका है कि JTET भाषा विवाद अब केवल चार या पांच भाषाओं का मामला नहीं रह गया है। यह झारखंड की भाषाई विविधता, सांस्कृतिक पहचान और जनजातीय समुदायों के सम्मान से जुड़ा एक बड़ा प्रश्न बन चुका है। अब सभी की नजर सरकार और समिति की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है कि इस विवाद का समाधान किस दिशा में आगे बढ़ता है।
