Jharkhand शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) के सिलेबस से भोजपुरी और मगही भाषाओं को हटाए जाने के फैसले के बाद राज्य में विरोध तेज हो गया है। सहायक शिक्षक संघ, लातेहार के जिला अध्यक्ष अतुल कुमार सिंह ने इस निर्णय पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे सरकार की “तानाशाही नीतियों” का प्रतीक बताया है। उनका कहना है कि यह फैसला स्थानीय भावनाओं और क्षेत्रीय भाषाई पहचान के खिलाफ है, जिससे शिक्षकों और युवाओं में गहरी नाराजगी पैदा हुई है।
स्थानीय भाषा और संस्कृति पर उठे सवाल
अतुल सिंह ने कहा कि पलामू प्रमंडल जैसे क्षेत्रों में भोजपुरी और मगही व्यापक रूप से बोली जाती हैं, ऐसे में इन्हें परीक्षा पाठ्यक्रम से हटाना स्थानीय संस्कृति की अनदेखी है। उन्होंने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि वर्तमान नीति ऐसी है जैसे एक आंख में काजल और दूसरी में कालिख लगा दी गई हो। उनका आरोप है कि बंगाली और उड़िया जैसी भाषाओं को शामिल किया जा रहा है, जबकि झारखंड की मूल भाषाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है, जो स्थानीय भावनाओं के साथ अन्याय है।
बाहरी उम्मीदवारों और रोजगार नीति पर विवाद
संघ का यह भी आरोप है कि JTET में केवल भारतीय नागरिक होने की शर्त रखकर राज्य के बाहर के उम्मीदवारों को भी समान अवसर दिया जा रहा है, जिससे स्थानीय युवाओं के हित प्रभावित हो रहे हैं। इसके अलावा, संगठन ने यह भी कहा कि हजारों अभ्यर्थी पहले ही केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा (CTET) पास कर चुके हैं, लेकिन राज्य सरकार उसे लागू करने में देरी कर रही है। इससे स्थानीय युवाओं के अवसर सीमित हो रहे हैं और असंतोष बढ़ रहा है।
संविदा शिक्षक और EWS शुल्क को लेकर नाराजगी
संघ ने संविदा पर काम कर रहे ‘पारा’ शिक्षकों के मुद्दे को भी उठाया है, जो पिछले दो दशकों से प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में योगदान दे रहे हैं, लेकिन उन्हें अब तक कोई विशेष सुविधा नहीं दी गई है। इसके साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के अभ्यर्थियों से सामान्य वर्ग के समान परीक्षा शुल्क लेने के फैसले को भी गलत बताया गया है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार जल्द संशोधित अधिसूचना जारी नहीं करती, तो व्यापक आंदोलन किया जाएगा और जनप्रतिनिधियों से भी इस मुद्दे पर दबाव बनाने की अपील की गई है।
