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Jharkhand News: क्या झारखंड था प्राचीन महासागर का केंद्र वैज्ञानिकों ने खोला करोड़ों साल पुराना रहस्य

Jharkhand News: धरती और समुद्र का रिश्ता केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह पृथ्वी के निर्माण और जीवन की उत्पत्ति से गहराई से जुड़ा हुआ है। पृथ्वी का लगभग तीन-चौथाई भाग समुद्र से घिरा हुआ है जो आदिकाल से ही मानव जिज्ञासा का केंद्र रहा है। समुद्र केवल जीवन का स्रोत ही नहीं बल्कि रहस्यों और संसाधनों का विशाल भंडार भी है। भारत भी प्राचीन काल से एक मजबूत समुद्री परंपरा वाला देश रहा है। समुद्री मार्गों ने व्यापार और संस्कृति दोनों को समृद्ध किया है। इसी महत्व को सम्मान देने के लिए हर वर्ष 5 अप्रैल को राष्ट्रीय समुद्री दिवस मनाया जाता है।

रांची का प्राचीन समुद्री इतिहास और भूगर्भीय संकेत

आज का रांची और झारखंड क्षेत्र भले ही एक पठारी भूभाग है लेकिन भूगर्भीय अध्ययन बताते हैं कि यह क्षेत्र करोड़ों वर्ष पहले समुद्री वातावरण का हिस्सा रहा होगा। यहाँ पाई जाने वाली चट्टानों में बलुआ पत्थर चूना पत्थर और शंख जैसे जीवाश्म इस बात के प्रमाण हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग 3.2 अरब वर्ष पहले पृथ्वी का पहला महाद्वीपीय भूभाग बना था और उस समय यह क्षेत्र समुद्री प्रभाव में था। छोटानागपुर पठार के निर्माण की प्रक्रिया में यह क्षेत्र समुद्र से ऊपर उठा और वर्तमान स्वरूप में आया।

सिंहभूम और राजमहल क्षेत्र के वैज्ञानिक प्रमाण

झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र से मिले भूगर्भीय साक्ष्य इस बात को मजबूत करते हैं कि यहां कभी समुद्र मौजूद था। अंतरराष्ट्रीय शोधों में जिरकोन कणों के विश्लेषण से प्राचीन नदियों और समुद्रों के संकेत मिले हैं। वहीं राजमहल क्षेत्र में मिले जीवाश्म बताते हैं कि यह इलाका कभी घने जंगलों और समुद्री वातावरण का मिश्रण रहा होगा। दामोदर घाटी और गोंडवाना बेसिन की चट्टानों में पाए गए अवसाद यह संकेत देते हैं कि यह क्षेत्र उथले समुद्र और तटीय वातावरण से प्रभावित रहा है।

भूगर्भीय बदलाव और आज का झारखंड

वैज्ञानिकों के अनुसार झारखंड की अधिकांश प्राचीन चट्टानें आर्कियन काल की हैं जो पृथ्वी के सबसे पुराने भूभागों में शामिल हैं। टेक्टोनिक गतिविधियों प्लेटों की टकराहट और भू-उत्थान की प्रक्रिया ने इस क्षेत्र को समुद्र से ऊपर उठाया। दामोदर घाटी में कोयले के भंडार और लाइमस्टोन जैसी चट्टानें भी समुद्री और दलदली वातावरण के प्रमाण हैं। इस प्रकार रांची और आसपास का क्षेत्र केवल एक पठार नहीं बल्कि करोड़ों वर्षों की भूगर्भीय यात्रा का जीवंत दस्तावेज है जो आज भी अपने भीतर प्राचीन समुद्री इतिहास को संजोए हुए है।

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