Jharkhand News: रांची में फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च को शाम 5:18 बजे शुरू होगी। ज्योतिषीय विशेषज्ञों के अनुसार, होलीका दहन 2 मार्च की आधी रात 12:50 बजे के बाद आयोजित होगा। रांची शहर में लगभग 150 स्थानों पर होलीका दहन होगा। होलीका दहन के लिए विभिन्न स्थानों पर लकड़ियों का इंतजाम किया गया है। धुलेंडी, यानी होली का त्योहार, 4 मार्च को मनाया जाएगा।
होलीका दहन के स्थान और तैयारी
रांची के कई क्षेत्रों में होलीका दहन का आयोजन किया जाएगा, जिनमें अपर बाजार, बकरी बाजार, कोकर, थड़पकना, हरमु रोड, किशोर गंज, हीनू, धुरवा और मोराबाड़ी शामिल हैं। इन स्थानों पर लकड़ी और गोबर की तिल्ली रखी जाएगी। लोग होलीका दहन स्थल को शुद्ध करके वहां लकड़ी या गोबर की तिल्लियों का ढेर बनाते हैं। इसके साथ ही पूजा के लिए रोली, चावल, फूल, जल, गुड़, हल्दी, हरी मूंग, गेहूं की बालियां आदि की व्यवस्था की जाती है।
पौराणिक मान्यताएँ और प्रतीकात्मक महत्व
होलीका दहन की कहानी श्रीमद्भागवत और अन्य पुराणों में वर्णित है। हिरण्यकशिपु नामक अत्याचारी राक्षस राजा ने स्वयं को भगवान घोषित किया। उनके पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु के कट्टर भक्त थे। हिरण्यकशिपु प्रह्लाद को मारने के कई प्रयास करता रहा, लेकिन भगवान के कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे। अंततः हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका को प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठने को कहा। हालांकि होलिका को आग से न जलने का वरदान मिला था, भगवान की कृपा से वह वरदान निष्फल हो गया। होलिका आग में जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। इस घटना को होलीका दहन के रूप में मनाया जाता है।
नकारात्मक ऊर्जा का अंत और नई शुरुआत
होलीका दहन बुराई और नकारात्मक भावनाओं के अंत का प्रतीक है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि क्रोध, ईर्ष्या, लालच और अहंकार जैसी नकारात्मक भावनियों को आग के हवाले कर आत्मा को शुद्ध करना चाहिए। भक्त होली के चारों ओर आहुति और घेरा लगाते हैं और अपने बच्चों की सुरक्षा, खुशहाली और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। होली की राख माथे पर लगाना नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और जीवन में सुख और शांति लाता है।
