भारतीय रुपया सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90.64 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। यह पिछले सर्वकालिक निचले स्तर 90.55 को भी पीछे छोड़ गया है। इस कमजोरी के पीछे अमेरिका-भारत के बीच चल रही व्यापार बातचीत में गतिरोध और विदेशी निवेशकों की लोकल इक्विटी तथा बॉन्ड बाजार से बिकवाली प्रमुख कारण हैं।
इस साल अब तक रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 5.5% गिर चुका है। अमेरिकी बाजार में भारतीय सामानों पर भारी टैरिफ के चलते भारत के एक्सपोर्ट पर नकारात्मक असर पड़ा है। विदेशी निवेशक 2025 में अब तक 18 बिलियन डॉलर से अधिक भारतीय स्टॉक्स बेच चुके हैं, जो भारत को पोर्टफोलियो आउटफ्लो के लिहाज से सबसे अधिक प्रभावित बाजार बनाता है। दिसंबर में विदेशी निवेशकों ने 500 मिलियन डॉलर से ज्यादा के बॉन्ड भी बेचे हैं।
मुंबई के एक बैंक के ट्रेडर के अनुसार, भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार की यह टिप्पणी कि व्यापार समझौता मार्च तक हो सकता है, ने बाजार की सेंटीमेंट को कमजोर कर दिया है। इसके अलावा, यूरोपीय संघ और भारत के बीच इस साल के अंत तक ट्रेड डील के अंतिम रूप न लेने की खबरों ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
हालांकि डॉलर इंडेक्स इस महीने 1.1% नीचे है, लेकिन ट्रेड डील में नकारात्मक माहौल के कारण रुपया डॉलर के लाभ को भुना नहीं पा रहा। फॉरेक्स एडवाइजरी फर्म IFA ग्लोबल ने भविष्यवाणी की है कि रुपया मध्यम अवधि में भी कमजोर प्रदर्शन जारी रख सकता है। अगले 6 हफ्तों में इसका दायरा 89.60 से 90.60 के बीच रहने की उम्मीद है।
क्या रुपया इस संकट से उबर पाएगा या गिरावट और तेज होगी, यह आने वाला समय ही बताएगा।

