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RanchiTourism & CultureJharkhand News Desk

चुटिया का 350 साल पुराना मंदिर नवरात्रि के नौ दिनों तक भगवान राम की भक्ति में डूबा रहता है; यहाँ 1970 से लड़कियाँ रामायण का पाठ करती आ रही हैं।

चुटिया का 350 साल पुराना मंदिर नवरात्रि के नौ दिनों तक भगवान राम की भक्ति में डूबा रहता है; यहाँ 1970 से लड़कियाँ रामायण का पाठ करती आ रही हैं।

रांची: शारदीय नवरात्र यानी मां दुर्गा की आराधना के नौ दिन, देशभर में इन दिनों देवी उपासना की अलग-अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं. लेकिन झारखंड की राजधानी रांची के चुटिया स्थित प्राचीन श्रीराम मंदिर में नवरात्र का स्वर कुछ अलग है. यहां नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना के साथ रामायण की चौपाइयां गूंजती हैं. कुंवारी कन्याएं सामूहिक रूप से रामायण का सस्वर पाठ करती हैं और इसी के साथ करीब पांच दशक से अधिक पुरानी धार्मिक परंपरा आगे बढ़ती है।

वर्ष 1970 से चली आ रही रामायण नवाह्न परायण महायज्ञ की यह परंपरा मंदिर को नवरात्र के दौरान विशेष पहचान देती है. चुटिया का यह मंदिर केवल पूजा-पाठ का स्थल नहीं, बल्कि रांची के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अतीत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. पत्थरों से निर्मित दो मंजिला मंदिर की प्राचीन वास्तुकला, इसे शहर के दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है. नागवंशी राजाओं के काल से जुड़े इस मंदिर के इतिहास और यहां की परंपराओं के कारण शारदीय नवरात्र के दौरान इसकी महत्ता और बढ़ जाती है।

नौ दिनों तक रामायण की चौपाइयों से गूंजता है मंदिर

शारदीय नवरात्र के दौरान मंदिर में आयोजित होने वाला रामायण नवाह्न परायण महायज्ञ यहां की प्रमुख परंपराओं में शामिल है. इसमें कुंवारी कन्याएं एक साथ बैठकर रामायण का पाठ करती हैं. नौ दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान में रामकथा के माध्यम से भगवान श्रीराम के आदर्शों, मर्यादा और जीवन मूल्यों को याद किया जाता है. सामूहिक पाठ के दौरान मंदिर का वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

कन्याएं करती हैं रामायण का पाठ

इस परंपरा की खासियत यह है कि इसमें नई पीढ़ी की भागीदारी को महत्व दिया जाता है. रामायण पाठ के माध्यम से कन्याओं को धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास किया जाता है. इसके साथ ही नारी शिक्षा और संस्कारों को प्रोत्साहित करने का उद्देश्य भी इस आयोजन से जुड़ा बताया जाता है. वर्ष 1970 में शुरू हुई यह परंपरा समय के साथ मंदिर की विशिष्ट पहचान बन गई है।

नागवंशी इतिहास से जुड़ा है मंदिर

चुटिया स्थित प्राचीन श्रीराम मंदिर का इतिहास नागवंशी राजाओं के शासनकाल से जुड़ा है. उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी में लगभग 1685-1687 ई के दौरान नागवंशी राजा रघुनाथ शाहदेव के समय कराया गया था. हालांकि, कुछ विवरणों में इसके निर्माण को लेकर अलग-अलग समय का उल्लेख मिलता है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, चुटिया क्षेत्र कभी नागवंशी राजाओं की राजधानी हुआ करता था।

प्राचीन संरचना और पत्थरों से निर्मित है मंदिर

मंदिर की प्राचीन संरचना और पत्थरों से निर्मित दो मंजिला स्वरूप उस दौर की स्थापत्य परंपरा की झलक प्रस्तुत करता है. मंदिर को मूल रूप से राधाबल्लभ मंदिर के नाम से भी जाना जाता था. वर्तमान में यहां भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ राधा-कृष्ण की प्रतिमाएं स्थापित हैं. इस तरह मंदिर में रामभक्ति और कृष्णभक्ति, दोनों की परंपराएं एक साथ दिखाई देती हैं. धार्मिक आस्था के साथ इसका ऐतिहासिक महत्व भी इसे रांची की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा बनाता है।

परंपराओं में रची-बसी है चुटिया की पहचान

चुटिया के इस प्राचीन मंदिर की पहचान केवल शारदीय नवरात्र के रामायण पाठ तक सीमित नहीं है. यहां होली के अवसर पर फगडोल जतरा निकालने की परंपरा भी प्रचलित रही है. इस दौरान भगवान के विग्रहों को सुसज्जित डोले में निकालकर धार्मिक यात्रा की जाती है. स्थानीय परंपरा के अनुसार, इसका संबंध नागवंशी राजाओं के समय से जोड़ा जाता है।

मंदिर से जुड़ी है ऐतिहासिक मान्यता

मंदिर से जुड़ी एक अन्य ऐतिहासिक मान्यता संत चैतन्य महाप्रभु के आगमन से संबंधित है. कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में अपनी यात्रा के दौरान वे इस क्षेत्र में रुके थे. हालांकि, इन ऐतिहासिक और स्थानीय मान्यताओं के अलग-अलग विवरण मिलते हैं. शारदीय नवरात्र के दौरान होने वाला रामायण पाठ इस प्राचीन मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपराओं में से एक है।

एक ओर मां दुर्गा की आराधना होती है, तो दूसरी ओर रामकथा के माध्यम से आदर्श जीवन और संस्कारों का संदेश दिया जाता है. यही संगम चुटिया के श्रीराम मंदिर को विशेष बनाता है.बदलते समय के बीच पांच दशक से अधिक समय से जारी यह परंपरा रांची की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने का माध्यम बनी हुई है।

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