Jharkhand News: राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) की एमबीबीएस प्रथम वर्ष की छात्रा काजल ने फर्जी अनुसूचित जाति (एससी) प्रमाणपत्र का इस्तेमाल कर प्रवेश लिया था। इस मामले की जांच में प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने के बाद सोमवार को रिम्स प्रबंधन ने उसका नामांकन रद्द कर दिया। इससे पहले काजल को 20 नवंबर को निलंबित किया जा चुका था। जांच में यह बात सामने आई कि प्रवेश प्रक्रिया में संभावित जालसाजी के साथ किसी सक्रिय गिरोह की भूमिका भी हो सकती है। इस पूरे मामले ने चिकित्सा प्रवेश परीक्षा और कॉलेजों की प्रवेश प्रणाली की सख्ती पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
तीन नोटिस के बाद भी छात्रा ने नहीं दिया जवाब
रिम्स ने सभी नामांकित छात्रों के प्रमाणपत्रों का सत्यापन संबंधित जिलों के उपायुक्तों को कराया था। गिरिडीह उपायुक्त की ओर से काजल के प्रमाणपत्र को फर्जी घोषित करने के बाद प्रबंधन ने उसे तीन बार नोटिस भेजे, लेकिन छात्रा की ओर से कोई जवाब नहीं आया। इसके बाद विधि सलाह लेकर रिम्स ने काजल को दोषी मानते हुए उसका नामांकन रद्द कर दिया। साथ ही उसे कक्षा में प्रवेश और होस्टल की सुविधा से भी वंचित कर दिया गया। रिम्स डीन (छात्र कल्याण) डॉ. शिव प्रिये ने बताया कि इस मामले की रिपोर्ट विभागीय संयुक्त सचिव और जेसीईसीईबी को भेज दी गई है और जालसाजी में शामिल गिरोह की पहचान के लिए भी कार्रवाई की जाएगी।

जेसीईसीईबी की प्रक्रियाओं पर उठे गंभीर सवाल
काजल ने झारखंड संयुक्त प्रवेश प्रतियोगिता परीक्षा पर्षद (जेसीईसीईबी) के माध्यम से एससी श्रेणी में रैंक-01 हासिल की थी। यह मामला झारखंड में फर्जी प्रमाणपत्रों की समस्या को फिर उजागर करता है। इससे पहले हजारीबाग मेडिकल कालेज में भी इसी प्रकार की धोखाधड़ी सामने आई थी। सूत्रों का कहना है कि अधिकांश जालसाजी प्रमाणपत्र जमा करने के दौरान होती है और कॉलेज स्तर पर ही सत्यापन के बाद यह खुलासा होता है। इससे जेसीईसीईबी की प्रवेश प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
प्राथमिकी दर्ज न करने का फैसला और छात्रा के नीट परीक्षा देने की संभावना
रिम्स प्रबंधन ने स्पष्ट किया है कि वह इस मामले में खुद से प्राथमिकी दर्ज नहीं करेगा। हालांकि फर्जी जाति प्रमाणपत्र बनाना और उसका उपयोग करना दंडनीय अपराध है, इसलिए स्वास्थ्य विभाग या जिला प्रशासन चाहे तो इस पर एफआईआर दर्ज कर सकता है। फिलहाल विभागीय कार्रवाई जारी है। रिम्स का कहना है कि छात्रा पर अभी नीट की ओर से कोई स्थायी रोक नहीं है, इसलिए वह दोबारा सामान्य श्रेणी के तहत परीक्षा दे सकती है। अगर भविष्य में आपराधिक मामला दर्ज होता है या नीट उसे धोखाधड़ी के तहत दंडित करता है तो स्थायी प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
विशेषज्ञों की राय: नीट फॉर्म और प्रमाणपत्रों का मिलान जरूरी
विशेषज्ञों का सुझाव है कि नीट फॉर्म में अभ्यर्थी द्वारा भरी गई श्रेणी और कॉलेज में नामांकन के समय प्रस्तुत प्रमाणपत्रों का सख्ती से मिलान किया जाना चाहिए। इससे इस तरह की धोखाधड़ी और जालसाजी को रोका जा सकता है। साथ ही जेसीईसीईबी जैसी प्रवेश परीक्षाओं की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और सख्ती बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि योग्य छात्र ही सही तरीके से प्रवेश पा सकें। इस मामले ने पूरे प्रवेश तंत्र की समीक्षा की जरूरत को एक बार फिर उजागर किया है।

