Jharkhand News: झारखंड के पलामू जिले के नावाबाजार प्रखंड स्थित चनेया गांव में दो गोतिया भाइयों कृष्णा दुबे और देव प्रकाश दुबे के बीच चल रहा पारिवारिक जमीन विवाद अब बड़ा मुद्दा बन चुका है। मामला केवल आपसी विवाद तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसमें पर्यावरण संरक्षण और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि ईंट भट्टा संचालक कृष्णा दुबे प्रशासन से मिलीभगत कर नियमों की अनदेखी कर रहे हैं और सार्वजनिक जमीन पर कब्जा भी किया गया है। दूसरी ओर देव प्रकाश दुबे जो छत्तीसगढ़ में रहते हैं लगातार स्थानीय थाना प्रखंड कार्यालय और जिला प्रशासन से शिकायत कर रहे हैं। उनका कहना है कि भट्टा संचालन से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी गई है। हालांकि उनकी स्थानीय अनुपस्थिति के कारण कई बार जांच प्रक्रिया अधूरी रह जाती है जिससे मामला और जटिल होता जा रहा है।
ग्रामीणों की राय में विवाद का मूल कारण जमीन और रोजगार का संतुलन
गांव के कई ग्रामीणों का मानना है कि यह पूरा विवाद जमीन से जुड़ा हुआ है न कि पर्यावरण से। केदार पाण्डेय संजय दुबे और रामनाथ दुबे जैसे स्थानीय लोगों के अनुसार गांव में ईंट भट्टा से किसी को बड़ी परेशानी नहीं है बल्कि इससे लोगों को रोजगार मिल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि खनन और भट्टा संचालन से धूल और धुआं तो उत्पन्न होता है लेकिन यह एक स्वीकार्य स्थिति है क्योंकि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलता है। उनके अनुसार हर जगह पक्की सड़क बनाना संभव नहीं होता और खनन क्षेत्रों में आमतौर पर सहमति से रास्तों का उपयोग किया जाता है। कुछ लोगों ने यह भी स्पष्ट किया कि समस्या स्थायी भट्टा से कम और अवैध अस्थायी भट्टों से अधिक उत्पन्न होती है। इस दृष्टिकोण से यह विवाद केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक संतुलन का भी विषय बन गया है।
मजदूरों और भट्टा संचालक ने रखी अपनी स्थिति
भट्टे पर काम करने वाले मजदूरों पारो देवी शिव भूईंया और लाला ने बताया कि उन्हें यहां नियमित रोजगार मिलता है जिससे उनकी आजीविका चल रही है। उनके अनुसार गांव में किसी प्रकार का बड़ा विवाद नहीं है और वे इस काम से संतुष्ट हैं। मजदूरों का कहना है कि धूल और धुआं जैसी समस्याएं उनके लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं जितना कि रोजगार का मिलना जरूरी है। वहीं भट्टा संचालक कृष्णा दुबे ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने सरकारी अनुमति के आधार पर ही भट्टा शुरू किया है। उनका दावा है कि गांव में किसी को कोई परेशानी नहीं है और केवल देव प्रकाश दुबे बार बार शिकायत कर उन्हें परेशान कर रहे हैं। उन्होंने प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि सच्चाई जांच के बाद ही सामने आनी चाहिए।
प्रशासन के सामने संतुलन साधने की बड़ी चुनौती
यह पूरा मामला अब प्रशासन के लिए एक गंभीर चुनौती बन गया है क्योंकि इसमें एक ओर पर्यावरण संरक्षण और नियमों के पालन का मुद्दा है तो दूसरी ओर ग्रामीणों की आजीविका और रोजगार का सवाल जुड़ा हुआ है। पूर्व जिला परिषद सदस्य अनुज भूंईंया और अन्य ग्रामीणों ने भी माना कि स्थायी ईंट भट्टा होने के कारण उसके आसपास कुछ प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है लेकिन रोजगार के दृष्टिकोण से ऐसे उद्योग जरूरी हैं। शिकायतों और आरोपों के बीच जांच प्रक्रिया कई बार बाधित होती है जिससे समाधान में देरी होती है। ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच करते हुए ऐसा संतुलित निर्णय लेना है जिससे न तो पर्यावरण को नुकसान हो और न ही ग्रामीणों की आजीविका प्रभावित हो। यह मामला आने वाले समय में स्थानीय प्रशासनिक कार्यप्रणाली की एक अहम परीक्षा भी साबित हो सकता है।
