बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछले दो दशक से राज्य की सत्ता पर काबिज हैं। जातीय समीकरण से ऊपर उठकर उन्होंने महिलाओं के जीवन में बड़े बदलाव लाने की कोशिश की। महिलाओं को सशक्त बनाने वाले उनके कई कदमों ने उन्हें राज्य की राजनीति में मजबूत बनाया। स्कूलों में लड़कियों को साइकिल देने से लेकर जीविका समूहों के जरिए लाखों महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने तक, नीतीश का महिलाओं के प्रति ये रुख उन्हें ‘सुशासन बाबू’ के रूप में स्थापित करता है। 2016 में राज्य में शराबबंदी का फैसला भी महिलाओं का दिल जीतने वाला कदम रहा।
लेकिन इसके बावजूद नीतीश कुमार कई बार महिलाओं को लेकर विवादों में फंसे। हाल ही में पटना के एक कार्यक्रम में उन्होंने एक महिला डॉक्टर के चेहरे से हिजाब हटाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। विपक्षी दलों ने इसे उनके मानसिक अस्थिरता का प्रमाण बताया। इससे पहले चुनाव प्रचार में उन्होंने भाजपा की महिला प्रत्याशी को माला पहनाई, जो पारंपरिक तौर पर महिलाओं को पहनाई नहीं जाती। केंद्रीय मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में एक महिला को सम्मानित करते हुए उन्होंने उसे अपने करीब खींच लिया, जिससे विवाद बढ़ा।
संसद में भी उनके विवादित बयान चर्चा में रहे। आरक्षण को लेकर उन्होंने महिलाओं की पढ़ाई को लेकर तंज कसा था, जिसके बाद उन्हें माफी मांगनी पड़ी। महिलाओं के एक कार्यक्रम में भी उन्होंने ‘मर्द लोग तो रोज-रोज करते ही रहता है’ जैसे अभद्र शब्द कहे।
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर महिलाओं के समर्थन पर निर्भर रहा है। लेकिन उनके ऐसे विवादित व्यवहार और टिप्पणियां उनकी छवि पर सवाल उठाती हैं। क्या सत्ता की इस लंबी दौड़ में उनकी नारी शक्ति के प्रति सच्ची संवेदनशीलता बनी रहेगी या ये विवाद उनके राजनीतिक भविष्य पर भी असर डालेंगे?
