Jharkhand के गुमला जिले का पारंपरिक वाद्ययंत्र मांदर आज भी जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान का मजबूत प्रतीक बना हुआ है। इसकी मधुर थाप न केवल संगीत का आनंद देती है बल्कि लोगों की भावनाओं और परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है। समय के साथ भले ही जीवनशैली और तकनीक में बदलाव आए हों, लेकिन मांदर की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। आज भी गांवों में यह वाद्ययंत्र हर घर में दिखाई देता है और इसकी थाप सुनते ही लोग खुद को झूमने से रोक नहीं पाते हैं।
जीआई टैग की दिशा में प्रयास तेज, प्रशासन और कारीगरों की उम्मीदें बढ़ीं
मांदर को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए गुमला जिला प्रशासन लगातार प्रयास कर रहा है। वर्ष 2023 में रायडीह प्रखंड के जर्जटा गांव स्थित मांदर प्रोड्यूसर कंपनी ने इसके लिए भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग के लिए आवेदन किया था। इसके बाद 20 दिसंबर 2024 को दिल्ली में अंतिम सुनवाई भी निर्धारित की गई, जिससे उम्मीदें बढ़ गई थीं। हालांकि तकनीकी कारणों से उस समय यह उपलब्धि हासिल नहीं हो सकी, लेकिन प्रक्रिया अभी भी जारी है और इसे लेकर कारीगरों में सकारात्मक उम्मीद बनी हुई है।
पारंपरिक निर्माण कला और ग्रामीण कारीगरों की पीढ़ियों की मेहनत
मांदर की सबसे बड़ी खासियत इसका पूरी तरह पारंपरिक तरीके से तैयार होना है। इसे बनाने में स्थानीय संसाधनों जैसे लाल मिट्टी, शंख नदी की मिट्टी, चमड़े की खाल और विशेष काले बालू का उपयोग किया जाता है। इसकी ध्वनि को मधुर बनाने के लिए चमड़े पर विशेष रंग लगाया जाता है, जिसे महिलाएं अपने हाथों से तैयार करती हैं। जर्जटा गांव के दो दर्जन से अधिक परिवार पीढ़ियों से इस कला से जुड़े हुए हैं और एक मांदर बनाने में तीन से आठ दिन का समय लगता है, जिसमें पूरा परिवार मिलकर काम करता है।
जीआई टैग से खुलेगा विकास का नया रास्ता, कारीगरों को मिलेगा बड़ा लाभ
यदि मांदर को जीआई टैग मिल जाता है तो यह न केवल गुमला बल्कि पूरे झारखंड के लिए बड़ी उपलब्धि होगी। इससे कारीगरों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और बाजार में मांदर की मांग तेजी से बढ़ेगी। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और युवा पीढ़ी इस पारंपरिक कला की ओर आकर्षित होगी। विशेषज्ञों के अनुसार जीआई टैग मिलने से इस हस्तशिल्प को कानूनी संरक्षण भी मिलेगा, जिससे इसकी पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत होगी।
