Jharkhand में ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के विकास को लेकर बुधवार को आयोजित एक कार्यशाला में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने अपने विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि झारखंड में आदिवासी समुदाय के पास करीब 35 प्रतिशत जमीन तो है, लेकिन वे उस जमीन का प्रभावी रूप से उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। इसका मुख्य कारण सिंचाई की कमी और खेती में आवश्यक संसाधनों की अनुपलब्धता है। उन्होंने बताया कि खेती योग्य जमीन का उपयोग और सिंचाई की सुविधा बेहतर करने पर ही ग्रामीण क्षेत्रों का समग्र विकास संभव हो पाएगा।
रमेश चंद ने देश भर के कृषि क्षेत्र की तुलना में झारखंड के किसानों की सिंचाई समस्या पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत में कुल फसलों का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा सिंचित है, जबकि झारखंड में यह आंकड़ा केवल 20 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट होता है कि झारखंड के अधिकांश किसान अपनी फसलों को पर्याप्त पानी नहीं दे पा रहे हैं, जिससे उत्पादन कम हो रहा है। सिंचाई की कमी की वजह से खेती में उत्पादन क्षमता घटती है और इससे किसान आर्थिक रूप से कमजोर हो रहे हैं। उन्होंने इस चुनौती को दूर करने के लिए बेहतर जल प्रबंधन और सिंचाई परियोजनाओं पर ध्यान देने की सलाह दी।
कार्यशाला में रमेश चंद ने झारखंड में धान की खेती की स्थिति पर भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि राज्य में अधिकांश किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इसका कारण है कि अधिकांश किसान अपने उत्पाद सीधे बाजार में बेचते हैं और MSP के तहत निर्धारित मूल्य नहीं मिल पाता। इससे किसानों की आमदनी प्रभावित हो रही है और वे आर्थिक रूप से कमजोर हो रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि MSP का प्रभावी क्रियान्वयन और किसानों को उचित बाजार सुविधा उपलब्ध कराना जरूरी है ताकि वे अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त कर सकें।
रमेश चंद ने झारखंड में खनन क्षेत्र की भूमिका पर भी अपनी राय व्यक्त की। उन्होंने कहा कि राज्य में खनन की गतिविधियां तो काफी अधिक हैं, लेकिन इसका राज्य की प्रति व्यक्ति आय में योगदान केवल दो प्रतिशत है। इसका मतलब है कि खनन से होने वाली आमदनी और रोजगार ग्रामीण और आदिवासी समुदायों तक ठीक से नहीं पहुंच पा रही है। नीति आयोग और ग्रामीण विकास विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यशाला में नीति आयोग के सलाहकार सुरेंद्र मेहरा, वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सुनील कुमार, के. श्रीनिवासन, मुकेश कुमार, जितेंद्र कुमार सिंह समेत अन्य वक्ताओं ने भी समावेशी विकास पर अपने विचार रखे। सभी ने इस बात पर बल दिया कि झारखंड के विकास के लिए आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए योजना बनाना आवश्यक है।

