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Tuesday, May 5, 2026
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Hemant Soren का जवाबी वार, असम में आदिवासियों के अधिकारों को बनाएगा राष्ट्रीय मुद्दा

असम की राजनीति में झारखंड मुक्ति मोर्चा की सक्रिय एंट्री के संकेत अब साफ दिखाई देने लगे हैं। झामुमो अध्यक्ष और झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren अब सीधे तौर पर असम की सियासत में दखल देने की तैयारी कर रहे हैं। आगामी असम विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी ने वहां के आदिवासी समाज की सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को बड़ा मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। माना जा रहा है कि यह पहल असम की मौजूदा सरकार के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकती है। झामुमो का फोकस उन समुदायों पर है जो लंबे समय से अपने अधिकारों और पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं लेकिन अब तक उन्हें वह संवैधानिक मान्यता नहीं मिल पाई है जिसके वे हकदार हैं।

झामुमो की इस रणनीति को हिमंत बिस्व सरमा को सीधा जवाब माना जा रहा है। वर्ष 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान हिमंत बिस्व सरमा ने झारखंड में सक्रिय कैंपिंग की थी और भाजपा ने उन्हें चुनाव का सह प्रभारी बनाया था। उस दौरान उन्होंने झारखंड की राजनीति में खुलकर हस्तक्षेप किया था। अब हेमंत सोरेन उसी सियासी शैली में असम की धरती पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं। फर्क इतना है कि झामुमो की राजनीति का केंद्र आदिवासी अधिकार सामाजिक न्याय और संवैधानिक बराबरी है। पार्टी का मानना है कि आदिवासी सवाल को मजबूती से उठाकर असम की राजनीति में नई बहस शुरू की जा सकती है।

मकर संक्रांति के बाद झामुमो का चार सदस्यीय उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल असम का दौरा करेगा। यह दल असम के आदिवासी बहुल इलाकों में जाकर जमीनी हालात का आकलन करेगा और वहां के आदिवासियों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगा। इस प्रतिनिधिमंडल में सांसद विजय हांसदा मंत्री चमरा लिंडा विधायक भूषण तिर्की और एमटी राजा शामिल हैं। झामुमो का उद्देश्य सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी नहीं बल्कि ठोस तथ्यों के आधार पर सरकार की नीतियों को कटघरे में खड़ा करना है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद असम में आदिवासी समुदाय की अनदेखी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकती है।

झामुमो की यह पहल केवल असम तक सीमित नहीं मानी जा रही है। इसे पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ती महत्वाकांक्षा के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। आदिवासी समुदाय से जुड़े मुद्दों को अलग अलग राज्यों में उठाकर झामुमो खुद को एक अखिल भारतीय आदिवासी आवाज के तौर पर स्थापित करना चाहता है। असम में अनुसूचित जनजाति का दर्जा न मिलने का सवाल उठाकर पार्टी भाजपा सरकार की नीतिगत विफलताओं को उजागर करने की तैयारी में है। आने वाले दिनों में यह रणनीति असम के चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकती है। हिमंत बनाम हेमंत की यह राजनीतिक जंग अब सिर्फ दो नेताओं तक सीमित नहीं रहकर आदिवासी अधिकारों और सामाजिक न्याय की बड़ी लड़ाई का रूप लेती दिख रही है।

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