Jharkhand News: झारखंड की हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन लिमिटेड यानी एचईसी की हालत बेहद नाजुक हो चुकी है। कंपनी को चलाना अब बहुत मुश्किल हो रहा है और अपने आर्थिक दायित्वों को पूरा करने में भी वह असमर्थ हो गई है। इतना ही नहीं, कर्मचारियों को वेतन देने में भी दिक्कतें आ रही हैं। कंपनी के भविष्य को लेकर गहरी चिंता बनी हुई है।
एचईसी का धीरे-धीरे क्षरण हो रहा है। फिलहाल कंपनी को बंद करने की प्रक्रिया सार्वजनिक उपक्रम विभाग (वित्त मंत्रालय) के अधीन चल रही है। कंपनी का संचित घाटा और देनदारियां 4300 करोड़ तक पहुंच चुकी हैं। 31 मार्च 2025 तक की वित्तीय देनदारियां अकेले 2067 करोड़ दर्ज हैं। कंपनी की कार्यशील पूंजी खत्म हो चुकी है और यह 1594 करोड़ तक पहुंच गई है।
कन्हैया लाल, जो भारी उद्योग मंत्रालय के अवर सचिव हैं, ने झारखंड हाई कोर्ट में सितंबर में दिए गए शपथ पत्र में बताया कि कंपनी संचालन के साथ-साथ वैधानिक दायित्वों को पूरा करने में असमर्थ है। एचईसी एक स्वतंत्र इकाई है, इसलिए कर्मचारियों के वेतन समेत सभी खर्चों के लिए सीधे जिम्मेदार है। मंत्रालय इसका रोज़ाना प्रबंधन या वेतन देने की जिम्मेदारी नहीं लेता।

लगातार सात वित्तीय वर्षों में कंपनी को कुल 1663 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। नेशनल इंस्टीच्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (NITI आयोग) ने अप्रैल 2021 में बंद करने की सिफारिश की थी। इसके बाद कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली विभिन्न समितियों ने भी 2023 में बंद करने की सिफारिश की।
एचईसी की निवल संपत्ति 1992 में खत्म हो गई थी। तब कंपनी को औद्योगिक वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (BIFR) को भेजा गया, जिसने 2004 में इसे बीमार घोषित कर बंद करने की सिफारिश की। इसके बाद पुनरुद्धार बोर्ड ने कंपनी को बचाने की सिफारिश की और केंद्र सरकार ने 2005 से 2017 तक लगभग 4400 करोड़ रुपए के पुनरुद्धार पैकेज दिए।
फिर भी कंपनी घाटे से बाहर नहीं आ सकी और कमजोर प्रदर्शन जारी रहा। विनिवेश की योजना भी असफल रही। 2018 में इसे परमाणु ऊर्जा विभाग में स्थानांतरित करने का प्रयास हुआ, लेकिन वह पूरा नहीं हो पाया।
अब एचईसी की हालत इस कदर खराब है कि इसे बचाने या बंद करने को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय जल्द लिए जाने हैं। कंपनी के सामने चुनौतियां बहुत बड़ी हैं और भविष्य अनिश्चित दिख रहा है।

