Jharkhand News : कभी नक्सलियों का सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जाने वाला सारंडा अब पूरी तरह नक्सलमुक्त, लेकिन आईईडी और पुराने जख्म अब भी चुनौती
Jharkhand News : झारखंड का सबसे घना जंगल सारंडा, जो कभी नक्सलियों का अभेद्य गढ़ माना जाता था, अब नक्सलमुक्त हो चुका है। केंद्रीय सुरक्षा बलों, झारखंड पुलिस और संयुक्त अभियानों ने तीन दशक पुराने लाल आतंक को खत्म करने में बड़ी सफलता हासिल की है। हालांकि जंगल में छिपे आईईडी और ग्रामीणों के मन में बैठा खौफ अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
झारखंड के लिए यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है। लगभग तीन दशकों तक नक्सली हिंसा, बारूदी सुरंगों और भय के साये में जी रहे सारंडा के जंगलों में अब शांति लौटती दिखाई दे रही है। कभी सैकड़ों नक्सलियों का सुरक्षित अड्डा रहे इस इलाके में अब सुरक्षा बलों की मजबूत पकड़ बन चुकी है और दावा किया जा रहा है कि यहां एक भी सक्रिय नक्सली मौजूद नहीं है।
सारंडा जंगल, जो झारखंड का सबसे घना और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है, लंबे समय तक नक्सलियों के लिए सुरक्षित शरणस्थली बना रहा। यहां कई राज्यों के नक्सली संगठन अपने शीर्ष नेताओं के साथ बैठकें करते थे और हिंसक रणनीतियां तैयार की जाती थीं। लेकिन लगातार चलाए गए अभियानों ने इस नेटवर्क को लगभग खत्म कर दिया।
ऑपरेशन नवजीवन से बदली तस्वीर
नक्सलवाद के खिलाफ केंद्र सरकार की रणनीति ने इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा देश को नक्सलमुक्त बनाने के लक्ष्य के तहत सुरक्षा एजेंसियों को मार्च 2026 तक की समयसीमा दी गई थी। इसके बाद केंद्रीय और राज्य सुरक्षा बलों ने संयुक्त रूप से बड़े स्तर पर अभियान चलाया।
इस अभियान में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, कोबरा बटालियन, झारखंड जगुआर और झारखंड पुलिस ने मिलकर काम किया। संयुक्त ऑपरेशन के तहत लगातार सर्च अभियान, खुफिया नेटवर्क और इलाके में स्थायी सुरक्षा ढांचे को मजबूत किया गया। इसी व्यापक कार्रवाई को ‘ऑपरेशन नवजीवन’ नाम दिया गया।
मिसिर बेसरा समेत बचे हुए नक्सली दबाव में
सूत्रों के अनुसार, कभी बड़े नेटवर्क का हिस्सा रहे अधिकांश नक्सली या तो मारे जा चुके हैं या गिरफ्तार हुए हैं। जानकारी यह भी सामने आई है कि एक करोड़ के इनामी नक्सली मिसिर बेसरा और असीम मंडल समेत करीब 15 सदस्यीय नक्सली समूह अब भी इधर-उधर छिपकर भाग रहा है।
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि लगातार बढ़ते दबाव और सीमित संसाधनों के कारण बचे हुए नक्सलियों के सामने आत्मसमर्पण के अलावा विकल्प बेहद कम बचा है। सुरक्षा बलों ने उनकी घेराबंदी और निगरानी तेज कर दी है।
नक्सली तो गए, लेकिन आईईडी अब भी सबसे बड़ा खतरा
हालांकि नक्सलियों की मौजूदगी खत्म होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन सारंडा में खतरा अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। सबसे बड़ी चुनौती जंगल में जगह-जगह लगाए गए आईईडी हैं।
सुरक्षा अधिकारियों ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि मुख्य रास्तों से हटकर किसी पगडंडी या वैकल्पिक रास्ते का इस्तेमाल बेहद खतरनाक हो सकता है। केंद्रीय बलों की कार्रवाई के बाद पीछे हटते समय नक्सलियों ने बड़ी संख्या में विस्फोटक उपकरण लगाकर सुरक्षा बलों और ग्रामीणों के लिए नया संकट पैदा कर दिया।
जंगल में पेट्रोलिंग कर रहे जवानों को हर कदम पर सावधानी बरतनी पड़ती है। एसआरपी और एलआरपी गश्ती दलों के लिए यह अब भी जोखिम भरा इलाका बना हुआ है।
आठ साल की बच्ची की मौत ने दिखाया था भय का चेहरा
सारंडा में नक्सलियों के खौफ का सबसे दर्दनाक उदाहरण जनवरी 2025 की वह घटना है, जिसने पूरे इलाके को झकझोर दिया था।
आठ साल की बच्ची सनियारो गागराई जंगल में पत्ता चुनने गई थी, तभी आईईडी विस्फोट की चपेट में आकर उसकी मौत हो गई। घटना के बाद आसपास मौजूद ग्रामीणों में इतना डर था कि बच्ची की मां ने शव को घर के अंदर छुपाकर रखा।
बताया जाता है कि घटना के बाद पहुंचे नक्सलियों ने परिवार को सुरक्षा बलों को जानकारी नहीं देने की चेतावनी दी थी। हालांकि बाद में केंद्रीय बलों को इसकी सूचना मिली और जवान मौके पर पहुंचे। उन्होंने न सिर्फ अंतिम संस्कार में मदद की, बल्कि परिवार को सरकारी सहायता दिलाने में भी सहयोग किया।
आज भी बच्ची की कब्र उसके घर के परिसर में मौजूद है, जो इस बात की गवाही देती है कि नक्सलवाद ने सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि आम लोगों की जिंदगी को भी गहरे घाव दिए।
विकास और विश्वास की नई शुरुआत
सारंडा का नक्सलमुक्त होना केवल सुरक्षा बलों की जीत नहीं, बल्कि उन हजारों ग्रामीणों की उम्मीदों की वापसी भी है जो वर्षों तक भय में जीते रहे। अब चुनौती इस इलाके में विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के जरिए स्थायी शांति स्थापित करने की है।
सारंडा के जंगलों में अब गोलियों की आवाज कम और बदलाव की उम्मीद ज्यादा सुनाई देने लगी है। लेकिन यह भी सच है कि स्थायी शांति के लिए सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि भरोसे और विकास से लड़ाई जीतनी होगी।
