बरही (हजारीबाग) निवासी प्रमोद विश्वकर्मा झारखंड का हजारीबाग जिला गिद्धों के लिए सुरक्षित आश्रय बन रहा है, जबकि देश के अधिकांश हिस्सों में गिद्धों की संख्या तेजी से घटकर विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई है
बरही-कोडरमा वन क्षेत्रों में गिद्धों का स्वाभाविक प्रजनन हो रहा है, जो उनकी नई पीढ़ी को तैयार करता है. इसके अलावा, गिद्ध सुरक्षित हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि इस क्षेत्र में पिछले 15 वर्षों में 95 गिद्धों का जन्म हुआ है और अब 400 से अधिक गिद्ध हैं। इसी क्रम में शुक्रवार को बरही प्रखंड के सुदूर मलकोको गांव में गिद्धों का एक बड़ा झुंड देखा गया
डॉ. भीम राव आंबेडकर पब्लिक स्कूल के आसपास सुनसान खेतों में 50 से अधिक छोटे-बड़े गिद्ध एक साथ अटखेलियां करते नजर आए। स्कूल के शिक्षक और समाजसेवी सूरज दास ने पहले इस दुर्लभ दृश्य को अपने फोन में कैद किया। सूचना मिलते ही स्कूली बच्चे और ग्रामीण दूर से इस अनोखे नजारे को देखने पहुंचे
लेकिन कुछ ही देर बाद सभी गिद्धों ने उड़ान भरी। इससे पहले फरवरी में भी बरही थाना क्षेत्र, देवचंदा गांव और नदी के किनारे गिद्धों को देखा गया था। बरही थाना परिसर में ताड़ के पेड़ पर गिद्ध के एक जोड़े ने घोंसला बनाकर प्रजनन किया, जहां अब दो बच्चे भी विकसित हो चुके हैं
देवचंदा गांव में एक सेमल के पेड़ पर पांच गिद्धों को एक साथ देखा गया। जिले के पक्षी विशेषज्ञ डॉ. मुरारी सिंह के अनुसार, बरही और आसपास का शांत एवं सुरक्षित वातावरण गिद्धों के लिए अत्यंत अनुकूल है
गिद्धों ने शायद इस जगह को अपना सुरक्षित प्रजनन क्षेत्र मान लिया हो। वन विभाग और पर्यावरणीय संस्थाओं के साथ मिलकर काम करने से घोंसलों की निगरानी, प्राकृतिक आवास की सुरक्षा और ग्रामीणों में जागरूकता बढ़ी है।
गिद्ध मृत पशुओं का भोजन करके पर्यावरण को शुद्ध करते हैं। वे बीमारियों के फैलाव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में अहम योगदान देते हैं। इसीलिए इन्हें प्रकृति का सफाईकर्मी भी कहा जाता है
2006 से पहले पशुओं के इलाज में डाइक्लोफेनेक नामक दवा ने लगभग 95 प्रतिशत गिद्धों को मार डाला था। इस दवा पर प्रतिबंध लगाने के बाद अब धीरे-धीरे उनकी संख्या में सुधार हो रहा है। इसी सकारात्मक बदलाव का संकेत हजारीबाग में गिद्धों की बढ़ती संख्या है
