Jharkhand High Court ने राज्य सरकार को संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों को पूरा करने के लिए अब स्पष्ट समयसीमा दे दी है। कोर्ट में सुनवाई राज्य के लोकायुक्त, राज्य मानवाधिकार आयोग और सूचना आयोग जैसे कई संवैधानिक निकायों में लंबे समय से खाली पड़े महत्वपूर्ण पदों को लेकर हुई। इस दौरान सरकार ने कोर्ट को जानकारी दी कि सभी नियुक्तियां छह सप्ताह के भीतर पूरी कर दी जाएंगी। हाईकोर्ट ने इस बयान को रिकॉर्ड पर ले लिया और अगली सुनवाई 17 मार्च के लिए निर्धारित कर दी। यदि समयसीमा के भीतर नियुक्तियां नहीं की गईं तो कोर्ट सख्त कदम उठा सकती है।
यह मामला कई जनहित याचिकाओं से जुड़ा है, जिन्होंने लोकायुक्त, राज्य का भ्रष्टाचार रोधी संगठन और अन्य संवैधानिक पदों पर वर्षों से लंबित नियुक्तियों पर सवाल उठाए थे। हाईकोर्ट ने सरकार की तरफ से की गई देरी और लंबित नियुक्तियों पर कड़ी टिप्पणी की, जिससे अब राज्य सरकार पर दवाब और बढ़ गया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि संवैधानिक निकायों की नियुक्तियों में विलंब सीधे तौर पर प्रशासनिक और कानूनी जिम्मेदारी के तहत लिया जाएगा। न्यायालय की सख्त चेतावनी से यह मामला अब राज्य में संवैधानिक पदों की महत्वता पर ध्यान खींच रहा है।
इस दौरान हाईकोर्ट ने एक अलग मामले में वकील महेश तिवारी के विवाद पर भी सुनवाई की। याद रहे कि महेश तिवारी ने अदालत में कहा था, “जजेस को अपने दायरे में रहना चाहिए।” इस बयान के बाद पांच जजों की पीठ ने स्वत: संज्ञान लिया और क्रिमिनल कंटेम्प्ट की प्रक्रिया शुरू की। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने कड़ी टिप्पणी की और वकील को बिना शर्त माफी दाखिल करने की सलाह दी।
आज Jharkhand High Court में सुनवाई के दौरान महेश तिवारी ने बिना शर्त माफी दी। कोर्ट ने माफी स्वीकार करते हुए मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। इससे स्पष्ट संदेश गया कि अदालत में सम्मान और न्याय प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। हाईकोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में किसी भी तरह के अनुशासनहीन व्यवहार को गंभीरता से लिया जाएगा। अब राज्य सरकार संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया पूरी करने के लिए दबाव में है और अगली सुनवाई में कोर्ट सख्त कदम उठा सकती है।
