Jharkhand हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस एस.एन. प्रसाद शामिल हैं, ने हजारीबाग-बरही एनएच-33 के चौड़ीकरण के दौरान पेड़ों की कटाई पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण को लेकर किए गए दावों और करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद जीवित पौधों की संख्या बेहद कम है। इस पर न्यायालय ने झारखंड स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (JHALSA) और याचिकाकर्ता को साइट का निरीक्षण कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि क्या वास्तव में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर जो वादे किए गए हैं, वे पूरे हो रहे हैं या नहीं।
सुनवाई के दौरान NHAI द्वारा प्रस्तुत जवाब से कोर्ट संतुष्ट नहीं हुई। NHAI ने बताया कि हजारीबाग से बरही के बीच पौधरोपण के लिए आवंटित 8 करोड़ रुपये का उपयोग कर लिया गया है और लगभग 2300 पौधे जीवित हैं। इस पर न्यायालय ने सवाल उठाया कि इतने बड़े बजट के बावजूद केवल इतने पौधे ही क्यों जीवित हैं। अदालत ने NHAI को निर्देश दिया है कि वे इस मामले में सभी बिंदुओं पर विस्तार से स्पष्टीकरण देते हुए नई रिपोर्ट जमा करें। न्यायालय ने साफ कर दिया है कि यह कोई औपचारिकता नहीं है बल्कि इसमें जवाबदेही तय की जाएगी।

यह जनहित याचिका इंद्रजीत समंता ने दायर की है जिसमें पेड़ों को काटने के बजाय सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि विभाग नियमित अंतराल पर पौधरोपण जरूर करता है, लेकिन सही देखभाल न होने के कारण अधिकतर पौधे सूख जाते हैं। केवल कागजों पर पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है, उन्हें जीवित रहकर वृक्षों में परिवर्तित होना आवश्यक है। देखभाल की कमी के कारण यह करोड़ों रुपये का खर्च केवल प्रशासनिक प्रक्रिया मात्र बनकर रह गया है। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई है कि पर्यावरण संरक्षण को केवल दिखावा न बना दिया जाए।
चीफ जस्टिस की अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अब JHALSA की टीम स्थल का निरीक्षण करेगी और पता लगाएगी कि वास्तव में कितने पौधे जीवित हैं और उनकी देखभाल कैसी हो रही है। इस रिपोर्ट के आधार पर अदालत आगे की कार्रवाई करेगी और NHAI के कामकाज पर नजर रखेगी। मामले की अगली सुनवाई 28 फरवरी को निर्धारित की गई है, जिसमें अदालत पूरे मामले की समीक्षा करेगी और आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करेगी। यह सुनवाई पर्यावरण संरक्षण के प्रति न्यायालय की गंभीरता को दर्शाती है।

