Jharkhand प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी के. राजू की राज्य इकाई पर पकड़ कमजोर पड़ती नजर आ रही है। एक बार फिर उनकी मौजूदगी में ही पार्टी के एक वरिष्ठ विधायक ने सार्वजनिक मंच से पार्टी लाइन के खिलाफ बयान दे दिया। बयान का लहजा तीखा था और भाषा में साफ तौर पर चेतावनी का भाव झलक रहा था। इससे यह संकेत मिलते हैं कि पार्टी के भीतर अनुशासन लगातार ढीला हो रहा है। यह कोई पहला मौका नहीं है जब प्रभारी की मौजूदगी में ऐसी स्थिति बनी हो। लगातार दूसरी बार कांग्रेस के अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आए हैं। इससे न केवल संगठन की साख पर असर पड़ रहा है बल्कि सरकार में पार्टी की एकजुटता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
इससे पहले भी झारखंड कांग्रेस में बड़ा विवाद सामने आया था। मंत्री डॉ. इरफान अंसारी, विधायक दल के नेता प्रदीप यादव और विधायक ममता देवी के बीच तीखी बहस और एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का वीडियो सामने आया था। यह मामला इतना बढ़ गया था कि केंद्रीय महासचिव को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा। सभी नेताओं को एक साथ बैठाकर कांग्रेस के हित में मिलकर काम करने की हिदायत दी गई थी। इसके बाद कुछ समय तक माहौल शांत जरूर हुआ लेकिन यह शांति ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकी। पार्टी के भीतर असंतोष की चिंगारी फिर से सुलगने लगी और एक नया मुद्दा सामने आ गया।
इस बार विवाद की जड़ बना है पेसा कानून। पंचायतों के अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार से जुड़े इस कानून के नियम और प्रक्रियाओं को लेकर कांग्रेस के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं। इस पूरे मामले में वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री डॉ. रामेश्वर उरांव का नाम सामने आ रहा है। आरोप है कि उन्होंने पेसा कानून की अनदेखी करते हुए नियम पारित किए जाने को लेकर पार्टी नेतृत्व को कड़े शब्दों में चेतावनी दी है। यह चेतावनी भी राज्य प्रभारी की मौजूदगी में दी गई और वह भी सार्वजनिक मंच से। इस घटनाक्रम ने कांग्रेस की स्थिति को और असहज कर दिया है। वहीं भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर पेसा को लेकर आरोप लगाती रही है और अब कांग्रेस के भीतर से उठ रही आवाजें भाजपा के आरोपों को और मजबूत करती दिख रही हैं।
इस तरह की घटनाएं निश्चित रूप से कांग्रेस की सरकार पर पकड़ को कमजोर करेंगी। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता भले ही खुलकर बयान नहीं दे रहे हों लेकिन अंदरखाने कार्यकर्ताओं को उकसाने का काम जरूर हो रहा है। इसका असर आने वाले दिनों में और ज्यादा देखने को मिल सकता है। भाजपा ने भी कांग्रेस पर हमले तेज कर दिए हैं और हर मौके पर संगठन की अंदरूनी कलह को जनता के सामने रख रही है। ऐसे में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती जमीनी स्तर पर सही संदेश देने की है। अगर समय रहते अनुशासन और आपसी तालमेल नहीं सुधारा गया तो आने वाला वक्त कांग्रेस के लिए और मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

