झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य की नदियों और जलस्रोतों से अतिक्रमण हटाने के मामले में सरकार की सुस्त कार्रवाई पर गहरी नाराजगी जताई है। चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने साफ शब्दों में कहा कि जलस्रोतों पर अतिक्रमण किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और कार्रवाई में किसी तरह का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है।
सोमवार को हरमू नदी और अन्य जलस्रोतों को अतिक्रमण मुक्त कराने की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। अदालत ने पाया कि जमीनी स्तर पर हालात चिंताजनक बने हुए हैं। कोर्ट को बताया गया कि हरमू नदी में मुक्तिधाम के पास भारी मात्रा में प्लास्टिक और कचरा जमा है, जिससे नदी की धारा लगभग अवरुद्ध हो चुकी है। इस पर अदालत ने नगर निगम को तत्काल हरमू नदी को प्लास्टिक मुक्त करने का निर्देश दिया और चेतावनी दी कि आदेश का पालन नहीं होने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जाएगी।
अदालत ने यह भी कहा कि जलस्रोतों की बदहाली केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सीधे जनस्वास्थ्य और शहरी जीवन से जुड़ा गंभीर संकट है। कोर्ट ने सरकार से पूछा कि बड़ा तालाब की सफाई को लेकर अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। सरकार की ओर से बताया गया कि रुड़की स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी से विशेषज्ञ रिपोर्ट मांगी गई है, ताकि गाद और गंदगी को वैज्ञानिक तरीके से हटाने की योजना बनाई जा सके।
हालांकि, प्रार्थी पक्ष ने तर्क दिया कि यह काम सितंबर में ही सौंपा गया था, लेकिन अब तक जमीन पर कोई ठोस नतीजा नजर नहीं आ रहा। इसके अलावा, न्याय मित्र ने कांके डैम, धुर्वा डैम और गेतलसूद डैम में भी अतिक्रमण की ओर अदालत का ध्यान दिलाया और कहा कि सरकार पूर्व के आदेशों का सही तरीके से अनुपालन नहीं कर रही है।
हाईकोर्ट ने पहले ही सभी जिलों में जलस्रोतों से अतिक्रमण हटाने, दोबारा अतिक्रमण न होने देने और ठोस कचरा जाने से रोकने के निर्देश दिए थे। अब अदालत ने सरकार से विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट और सफाई की समय सीमा बताने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई पांच जनवरी को होगी, जिस पर सबकी नजर टिकी है।

