Jharkhand News : गंगा दियारा क्षेत्र में वर्षों से लंबित सीमांकन कार्य ठप, हर साल फसल कटाई को लेकर बढ़ता विवाद और हिंसा
Jharkhand News : झारखंड और बिहार की सीमा पर स्थित गंगा दियारा क्षेत्र में जमीन सीमांकन का मुद्दा एक बार फिर अधर में लटक गया है। किसानों का आरोप है कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण वर्षों से विवाद जारी है, जिससे हर साल फसल कटाई के समय संघर्ष और हिंसा होती है।
Jharkhand News : झारखंड और बिहार के बीच सीमा निर्धारण का मुद्दा एक बार फिर ठहर गया है। पिछले साल हाईकोर्ट के निर्देश के बाद 8 दिसंबर 2025 को सीमांकन की प्रक्रिया शुरू हुई थी, लेकिन महज 10 से 15 दिनों के भीतर यह काम बंद हो गया। इससे परेशान किसान अब एक बार फिर अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं।
किसानों का कहना है कि यह समस्या कोई नई नहीं है। वर्ष 2018 में भी उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसके बाद सीमांकन का आदेश तो मिला, लेकिन उसका सही तरीके से पालन नहीं हो सका।
करीब सात वर्षों के इंतजार के बाद किसानों ने फिर न्यायालय का रुख किया था। अदालत ने साहिबगंज और कटिहार जिला प्रशासन को निर्देश दिया था कि किसानों की समस्या का समाधान कर रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।
इसके बाद मनिहारी अंचल (बिहार) और साहिबगंज अंचल (झारखंड) की संयुक्त टीम बनाई गई। हालांकि, जमीन पर काम करने के दौरान समन्वय की भारी कमी देखने को मिली। कभी एक टीम पहुंचती थी तो दूसरी अनुपस्थित रहती थी। इस कारण सीमांकन का काम अधूरा रह गया।
अधिकारियों के अनुसार, उपकरणों की कमी और कर्मचारियों के अनुभव की कमी भी इस देरी की बड़ी वजह बनी। साहिबगंज के अंचलाधिकारी ने बताया कि आंशिक सीमांकन हुआ है, लेकिन पेड़ों और प्राकृतिक बाधाओं के कारण कार्य पूरा नहीं हो सका।
झारखंड के गठन को 26 साल हो चुके हैं, लेकिन गंगा किनारे स्थित उपजाऊ जमीन का सीमांकन अब तक नहीं हो पाया है। इसका परिणाम यह है कि जमीन का मालिक कोई और है और खेती कोई दूसरा कर रहा है।
सबसे गंभीर स्थिति तब उत्पन्न होती है जब फसल कटाई का समय आता है। हर साल किसान आपस में भिड़ जाते हैं, जिससे हिंसक घटनाएं होती हैं। कई मामलों में जान तक जा चुकी है, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के जिला सह सचिव मो. मुशा ने इस मामले को लेकर प्रशासन को पत्र लिखा है। उन्होंने मांग की है कि सीमांकन कार्य निष्पक्ष तरीके से कराया जाए और इसके लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की जाए।
उन्होंने सुझाव दिया है कि मनिहारी और साहिबगंज के एसडीओ को पुलिस बल के साथ मौके पर तैनात किया जाए ताकि किसी भी तरह का विवाद या बाधा न उत्पन्न हो।
करीब चार महीने पहले शुरू हुए सर्वे कार्य के दौरान स्थानीय स्तर पर विरोध भी सामने आया। कुछ दबंग और स्वार्थी तत्वों ने सीमांकन प्रक्रिया का विरोध किया, जिससे स्थिति और जटिल हो गई।
विवाद का एक बड़ा कारण यह भी है कि सर्वे पुराने ऐतिहासिक स्थलों जैसे किलों के आधार पर किया जाए या आधुनिक सरकारी मानकों के अनुसार। इस भ्रम ने प्रशासनिक प्रक्रिया को और धीमा कर दिया है।
किसानों और स्थानीय नेताओं ने मांग की है कि सीमांकन आधुनिक तकनीक और नए सरकारी मानकों के अनुसार किया जाए। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी बल्कि भविष्य में विवाद की संभावना भी कम होगी।
उनका कहना है कि वर्षों से जारी शोषण और अनिश्चितता से मुक्ति पाने के लिए यह जरूरी है कि स्पष्ट और स्थायी समाधान निकाला जाए।
बताया जा रहा है कि 2018 में कोर्ट के आदेश के बाद कुछ स्थानों पर सीमेंट के पिलर लगाए गए थे, लेकिन उनका भी कोई ठोस प्रभाव नहीं पड़ा। इस बार भी उसी आधार पर मापी शुरू की गई थी, लेकिन काम अधूरा रह गया।
खासतौर पर थाना संख्या 319 के अंतर्गत आने वाले खाता संख्या 739 और खसरा संख्या 2384, 2383, 2347, 2349 की जमीन का सीमांकन अभी भी लंबित है।
झारखंड-बिहार सीमांकन विवाद अब सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह किसानों की आजीविका और जीवन से जुड़ा सवाल बन चुका है। हर साल होने वाले विवाद और हिंसा को रोकने के लिए जरूरी है कि सरकार और प्रशासन इस मुद्दे को प्राथमिकता दें।
यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो किसानों का आक्रोश और बढ़ सकता है और यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।
